जब शरीर के एक या अधिक अंगों या तंत्रों के प्रकार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और विभिन्न चिह्न और लक्षण प्रकट होते हैं तो हम कहते हैं कि हम स्वस्थ नहीं हैं अर्थात् हमें रोग हो गया है। रोगों को मोटे तौर पर संक्रामक और असंक्रामक समूहों में बाँटा जा सकता है।
प्रश्न 1.
कौन-से विभिन्न जन स्वास्थ्य उपाय हैं जिन्हें आप संक्रामक रोगों के विरुद्ध रक्षा-उपायों के रूप में सुझायेंगे?
उत्तर
संक्रामक रोगों के विरुद्ध हम निम्नलिखित जन-स्वास्थ्य उपायों को सुझायेंगे –
- अपशिष्ट व उत्सर्जी पदार्थों का समुचित निपटान होना।
- संक्रमित व्यक्ति व उसके सामान से दूर रहना।
- नाले-नालियों में कीटनाशकों का छिड़काव करना।
- आवासीय स्थलों के निकट जल-ठहराव को रोकना, नालियों के गंदे पानी की समुचित निकासी होना।
- संक्रामक रोगों की रोकथाम हेतु वृहद स्तर पर टीकाकरण कार्यक्रम चलाये जाना।
प्रश्न 2.
जीव विज्ञान (जैविकी) के अध्ययन ने संक्रामक रोगों को नियन्त्रित करने में किस प्रकार हमारी सहायता की है?
उत्तर
जीव विज्ञान (जैविकी) के अध्ययन ने संक्रामक रोगों को नियन्त्रित करने में हमारी सहायता निम्नलिखित प्रकार से की है –
- जीव विज्ञान रोगजनकों को पहचानने में हमारी सहायता करता है।
- रोग फैलाने वाले रोगजनकों के जीवन चक्र का अध्ययन किया जाता है।
- रोगजनक के मनुष्य में स्थानान्तरण की क्रिया-विधि की जानकारी होती है।
- रोग से किस प्रकार सुरक्षा की जा सकती है, ज्ञात होता है।
- बहुत से रोगों के विरुद्ध इन्जेक्शन तैयार करने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 3.
निम्नलिखित रोगों का संचरण कैसे होता है?
- अमीबता
- मलेरिया
- ऐस्कैरिसता
- न्यूमोनिया।
उत्तर
1. अमीबता (Amoebiasis) – अमीबता या अमीबी अतिसार (amoebic dysentery) नामक रोग मानव की वृहद् आंत्र में पाए जाने वाले एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entumoeba histobytica) नामक प्रोटोजोआ परजीवी से होता है। इस रोग के लक्षण कोष्ठबद्धता (कब्ज), उदर पीड़ा और ऐंठन, अत्यधिक श्लेष्म और रुधिर के थक्के वाला मल आदि हैं। इस रोग की वाहक घरेलू मक्खियाँ होती हैं जो परजीवी को संक्रमित व्यक्ति के मल से खाद्य और खाद्य पदार्थों तक ले जाकर उन्हें संदूषित (contaminated) कर देती हैं। संदूषित पेयजल और खाद्य पदार्थ संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं। इससे बचने के लिए स्वच्छता के नियमों का पालन करना चाहिए और खाद्य पदार्थों को ढककर रखना चाहिए।
(ख) मलेरिया (Malaria) – इस रोग के लिए प्लाज्मोडियम (Plasmodium) नामक प्रोटोजोआ उत्तरदायी है। मलेरिया के लिए प्लाज्मोडियम की विभिन्न प्रजातियाँ (जैसे–प्ला० वाइवैक्स, प्ला० मैलेरिआई, प्ला० फैल्सीपेरम) तथा प्ला० ओवेल उत्तरदायी हैं। इनमें से प्ला० फैल्सीपेरम (Plasmodium fulsipurum) द्वारा होने वाला दुर्दम (malignant) मलेरिया सबसे गम्भीर और घातक होता है। इसके संक्रमण के कारण रक्त केशिकाओं में थ्रोम्बोसिस हो जाने के कारण ये अवरुद्ध हो जाती हैं और रोगी की मृत्यु हो जाती है
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, “मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की पूर्णरूपेण कुशलता की अवस्था स्वास्थ्य कहलाती है, केवल रोग की अनुपस्थिति ही नहीं" (Health is a state of perfect physical, mental and social well being and not just absence of diseases)। व्यक्ति विशेष की वैयक्तिक सन्तुष्टि (personal satisfaction) का भी स्वास्थ्य की परिपूर्णता में महत्त्वपूर्ण योगदान है। व्यक्ति की आदतें, व्यवहार, चरित्र, वैयक्तिक लक्षण, भौतिक पर्यावरण के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक पर्यावरण भी स्वास्थ्य का निर्धारण करते हैं। निम्न कारक स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं
(i) पर्यावरणीय प्रदूषण (Environment pollutants)
(ii) रोगाणु (Pathogens)
(iii) आनुवंशिक विसंगतियाँ (Genetic disorder/deficiencies)
(iv) त्रुटिपूर्ण जीवनशैली (Incorrect life style) इसमें गलत/ अस्वास्थ्यकर खानपान, व्यायाम व नींद की कमी/उठने-बैठने व चलने का गलत ढंग, गलत आदतें शामिल हैं।
(v) यान्त्रिक चोटें।
रोग-मनुष्य के सामान्य स्वास्थ्य में विचलन पैदा करने वाला कोई भी प्रकार्यात्मक परिवर्तन जो मनुष्य की सामान्य शारीरिक क्रियाओं में बाधा उत्पन्न करता है अथवा व्यक्ति के लिए असुविधा या अक्षमता का कारण बनता है रोग (disease) कहलाता है। डिसीस (disease) शब्द का शाब्दिक अर्थ है (away or without ease) व्यक्ति की दक्षता में कोई गिरावट भी रोग की ही परिचायक कही जाती है। लेकिन महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इस दक्षता का अर्थ भिन्न-भिन्न आयु, लिंग व वर्ग के व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न होता है। दूसरे शब्दों में, शरीर के सामान्य प्रकार्यों में बाधा उत्पन्न करने वाली स्थिति ही रोग (disease) कहलाती है।

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